High CourtsSingle Bench

Ramnath And Another vs Deputy Director Of Consolidation, Basti And Others

Allahabad High Court · Decided on 20 May 2026 · Citation: (2026) 05 AHC CK 0419

HON’BLE JUDGES
Saurabh Shyam Shamshery, J
RESULT
Dismissed
CASE NUMBER
Writ - B No. 5784 Of 1981
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Judgment

58 paragraphs · 6,249 words

Saurabh Shyam Shamshery, J

1.

Parties to the litigation belongs to common ancestors. In basic consolidation records names of original petitioners, i.e., Ram Nath and Kripa Nath sons of Ram Sumer and Bujhawan, were recorded probably on a ground being Karta of a joint Hindu family, parties were member of it and land in dispute (Khata No. 112 and 338) was ancestral land, whereas original petitioners claimed ownership on land in dispute being self acquired.

2.

An objection was filed by contesting-respondents that on above ground their names be recorded as co-tenure and on basis of statement of Bujhawan and Ram Naresh, objection was allowed vide an order dated 15.03.1965 passed by the Consolidation Officer.

3.

Above order was challenged by way of filing a belated appeal at behest of petitioners that decision was wrongly passed on basis of statements only, whereas it ought to have been considered on merit. Delay of about 10 years was condoned and belated appeal was allowed vide order dated 11.10.1976 and matter was remitted to the Consolidation Officer to pass a fresh order on merit. Relevant part of said order is reproduced hereinafter:

"आदेश

यह à¤...पील चकबंदी à¤...धिकारी के आदेश दिनांक 15.03.65 के विरूद्ध धारा 11(1) जोत० à¤...धिनियम के à¤...न्तर्à¤-त प्रस्तुत की à¤-ई है। à¤-ाता के 112, 334 आधार वर्ष की à¤-तौनी से रामनाथ कृपानाथ राम सुमेर , बुझावन पुत्र à¤-िरजा के नाम आधार वर्ष में दर् है रामनरेश , रामसुरेश पुत्र महाबीर का भी नाम तसदीक à¤-तौनी के समय à¤"र सहà¤-ातेदार दर्ज किया जाना à¤-या। स०स० ने साक्ष्य लेने के पश्चात् रामनरेश , रामसुरेश पुत्रान महावीर का नाम बतौर सहà¤-ातेदार à¤-ाता सं 112, 334, पर दर्ज करने का आदेश पारित किया। इस आदेश के विरुद्ध यह à¤...पील प्रस्तुत की à¤-ई है।

à¤...पीलान्ट के विद्वान à¤...धिवक्ता की बहस सुनी à¤-ई। किन्तु रेस्पान्डेन्ट की à¤"र से बावजूद à¤-जट कराने कोई हाजिर नहीं आया। à¤...तएव रेस्पान्टेन्ट के विरुद्ध एकतरफा आदेश हुआ à¤-ुण दोष के आधार पर किया जाता है। à¤...पीलान्ट के विद्वान à¤...धिवक्ता ने बहस की रामनरेश, राम सुरेश पुत्रान महावीर न ही उनके परिवार के संबंधित हैं à¤"र न उनका कब्जा दà¤-ल आराजी निजाई पर है तथा à¤...धीनस्थ न्यायालय को धोà¤-ा देकर दोनों à¤-ातों पर रेस्पान्टेन्ट ने à¤...पना नाम दर्ज करा लिया है तथा वास्तव में à¤...धीनस्थ न्यायालय द्वारा नोटिस नहीं जारी की थी जो नोटिसें à¤...धीनस्थ न्यायालय की पत्रावली पर संलà¤-्न है वह फर्जी है तथा केवल रामनरेश रेस्पान्टेन्ट ने लिà¤-ित à¤-ातेदारान को नोटिस विधिवत् दाà¤-िल होने नहीं दिया तथा सभी नोटिसें मुà¤-्तार दीनानाथ के हस्ताक्षर बनवा लिये हैं तथा à¤...धीन न्यायालय के समक्ष à¤...पीलान्ट रामनाथ कृपानाथ पुत्रान रामसुमेर को उक्त मुकदमें की जानकारी नहीं होने दी तथा स०च० द्वारा जो तामीलात में बयान दिया à¤-या तामीलात में रामनरेश, पुत्रान का बयान दिया à¤-या प्रतीत होता है । जबकि दो पक्षों का शामीलात के बयान होने का कोई प्राविधान नहीं है तथा यह बयान भी दोषपूर्ण है क्योंकि इस बयान में आराजी निजाई का à¤-ाता संà¤-्या à¤-ाटा सं कोई जिक्र नहीं à¤-या है तथा च०à¤...० ने à¤...पने आदेश में यह à¤...ंकित किया कि फरीकै न के बयान लिये à¤-ये जो सत्य है तथा च०à¤...० ने आदेश में स्वीकृत के à¤...ंश निर्धारित नहीं किये थे। चूंकि रेस्पान्डेंट्स के कोई कोई à¤...ंश निर्धारित नहीं किये à¤-ये हैं। चूंकि रेस्पान्डेंट्स के कोई à¤...ंश निर्धारित नहीं किये à¤-ये थे इसलिये à¤...पीलान्ट को च०à¤...० के आदेश की जानकारी नहीं हो पाई। रेस्पान्डेंट्स रामनरेश, रामसुरेश पुत्रान महाबीर ने जो० च० à¤...धिनियम की धारा 48(3) के à¤...न्तर्à¤-त उप संचालक चकबंदी के न्यायालय में बटवारे की दरà¤-्वास्त दिनांक 13-12-74 को प्रस्तुत की जिसकी जानकारी à¤...पीलान्ट को दिनांक 30-12-75 को हुई तथा जानकारी के प्राप्त होने के जवाब तुरन्त यह à¤...पील दाà¤-िल कर दी à¤-ई तथा उप संचालक चकबंदी द्वारा रामनरेश रामसुरेश की दरà¤-्वास्त à¤-ारिज कर दी à¤-ई। à¤...तएव à¤...पीलान्ट को धारा 5 कानूनी म्याद का लाभ दिये जाने तथा साक्ष्य लिये जाने के पश्चात् वाद का निस्तारण à¤-ुण व दोष के आधार पर किया जाना। वास्तव में शामीलात शपथ पत्र का बयान लेने का कोई प्राविधान नहीं है तथा इस बयान में आराजी निजाई का भी कोई उल्लेà¤- नहीं किया à¤-या है इसलिये साक्ष्य लेने के पश्चात् à¤-ुण व दोष के आधार पर निर्णय किया जाना ही न्याय संà¤-त प्रतीत होता है। यह à¤...पील म्याद बाहर है इसलिये धारा 5 कानूनी म्याद का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत होता है व उपरोक्त विवेचन के आधार पर मैं निम्न आदेश देता हूँ।

à¤...पील स्वीकार की जाती है । चकबंदी à¤...धिकारी का आदेश निरस्त किया जाता है। तथा वाद च०à¤...० को इस निर्देश के साथ प्रत्यावर्तित किया जाता है कि फरीकै न का साक्ष्य लेने के पश्चात् वाद का निस्तारण à¤-ुण व दोष के आधार पर करें। à¤...पीलान्ट को चकबंदी à¤...धिकारी के न्यायालय में दिनांक 30-12-76 को उपस्थित होने के लिये सूचित किया à¤-या । च०à¤...० à¤...पने न्यायालय में à¤...न्य भी फरीकै न को नोटिस जारी करायें तथा वाद का निस्तारण à¤-ुण व दोष के आधार पर करें।" (Emphasis supplied)

4.

In pursuance of above, the Consolidation Officer on basis of oral and documentary evidence passed a fresh order dated 13.12.1978, whereby it was held that property in dispute was ancestral and contesting respondent were co tenure. Claim of original petitioners of self acquisition was rejected. Relevant part of order is reproduced hereinafter:

प्रस्तुत वाद विद्वान न्यायालय à¤...पील के आदेश दिनांक 11.10.76 à¤...पील संà¤-्या 7950 द्वारा à¤-ुण दोष के आधार पर पुनः निर्णय हेतु प्रत्यावर्तित किया à¤-या है। वाद प्रत्यावर्तित पक्षो को सबूत व शहादत का समुचित à¤...वसर के बाद विस्तार पूर्वक सुना à¤-या।

विवाद à¤-ाता नम्बरान 112 ब व 334 से संबंधित है। जो काà¤-जात आधार वर्ष में रामनाथ व कृपानाथ पुत्रà¤-ण रामसुमेरन व बुझावन पुत्र बिराज के नाम वर्à¤- 1 व 2 à¤...ंकित है। उक्त à¤-ाते में रामनरेश व रामसुरेश का नाम शामिल है। चकबंदी पड़ताल व à¤-तौनी तस्दीक के समय बताया à¤-या। वाद का निर्णय फरीकै न की उपस्थिति में दिनांक 15-3-65 को किया à¤-या। जिसके विरुद्ध रामनाथ आदि à¤...पील प्रस्तुत किया। पत्रावली à¤-ुण दोष के आधार पर निर्णय हेतु प्रत्यावर्तित की à¤-ई। पक्ष एक दसरे के हक को स्वीकार नहीं करते। बुझावन सहमत है कि उनके वारिस मुकदमा फरीक हैI

फरीकै न के कथन पर निम्न तनकीह निर्णयार्थ कायम हो à¤-ई है। क्या रामसुरेश व रामनरेश à¤-ाता निजाई के सहà¤-ातेदार है। यदि हां तो उनका à¤...ंश क्या है? आमनरेश आदि ने à¤...पने हक को साबित करने के लिए कोई काà¤-जी सबूत दाà¤-िल नहीं किया है। उन्होंने एक उजदारी दिनांक 3-12-77 को दाà¤-िल किया है। जिसके पैरा 7 में निम्न à¤-ानदान शजरा दिया है।

उजुरदारोह के पेरा 2 में कहा à¤-या कि फरीकै न मुस्तर्का हिन्दू à¤-ानदान के है विवादित भूमि मुस्तर्का पैदा को à¤-ई है। पैरा 3 में कहा à¤-या कि आराजी निजाई फरीकै न के पूर्वजो को मुस्तर्का पैदा करदा है। जिस पर फरीकै न मुस्तर्का काबिज दाà¤-िल है पैरा 4 में यह कहा à¤-या है कि रामनाथ व कृपानाथ का तनहा कब्जा नहीं है। पैरा 5 में कहा à¤-या है कि विवादित भूमि के संबंध में वाद चकबंदी à¤...धिकारी के न्यायालय में चल चुका है जिसमें बुझावन शपथ पूर्वक बयान देकर उनका कब्जा व सहà¤-ातेदारी तस्दीक किया है। पैरा 6 में कहा à¤-या है कि प्रतिवादीà¤-ण ने à¤...सलियत को छिपाया है। à¤...तः निवेदन किया à¤-या है कि आराजियात निजाई के नाम रामनरेश आदि बतौर सहà¤-ातेदार दर्ज करके à¤-ाता चकबंदी à¤...लà¤- किया à¤-या है।

रामनाथ व कृपानाथ ने उक्त उजुरदारी के à¤-िलाफ कोई बयान तहरीरी दाà¤-िल नहीं किया है।

रामनरेश के बयान मजीद मे उक्त à¤-ानदान सजरा दिया है जिसके à¤-िलाफ कृपानाथ ने कोई बात à¤...पने बयान मजीद में नही कहा है जब कि उनका बयान राम नरेश à¤"र उनके à¤-वाह के बाद हुआ इस प्रकार इस प्रकार रामनरेश द्वारा दिया à¤-या à¤-ानदान शजरा प्रमाणित है। इससे स्पष्ट है कि फरीकै न एक ही मूरिस फकीर की à¤"लाद है। रामनरेश ने बयान म जीद में यह कहा है कि बिहारी व दसरथ लाव ल्द मर à¤-ये उनके पिता बूजा मुस्तर्का रहते थे। à¤...à¤-ुवा व पेशवाकार घऱ के बिरजा थे । à¤...ब जायदाद मुस्तर्का है आराजी निजाई à¤-ल्ती से बि रजा के à¤-ानदान में तनहा चली आई। चकबंदी में उजूरदारी किया। बुझावन आदि ने सुलह कर लिया। इस बयान के à¤-िलाफ भी कृपा नाथ ने कोई बात बयान मजीद में नहीं कहा है। इससे यह साबित होता है कि बिहारी व द सरथ लावलद मर à¤-यI

महावीर व विरजा शामिल शरीक रहे à¤"र विरजा घर के à¤...à¤-ुवा तथा à¤-ानदान कर्ता रहे। जायदाद निजाई मुस्तर्का है जो विरजा के à¤-ानदान तनहा चली à¤-यी। चकबंदी मे बुझावन आदि में उनका हक सहà¤-ातेदारो तस्दीक किया à¤-या। इस संबंध में बयान रामनरेश काविले विश्वासनीय है। कृपा नाथ ने बयान आदि में कहा है कि विवादित भूमि उनका कब्जा बापदाद के जमाने से चला आ रहा है। तथा विवादित भूमि को उनके पिता ने à¤...र्जित किया है कानून की दृष्टि में हिन्द पू रिवार का संयक्त रहना माना जाता है। जब तक बंटवारा न साबित हो। कृपा नाथ ने बयान मजकूर आदि में कहीं नहीं कहा है कि बंटवारा कब हुआ। बंदोबस्त सन् 1323 फ० में जिसकी नकल रामनरेश ने दाà¤-िल किया है।

à¤-ाता 111 फरीकै न के नाम मुस्तर्का दर्ज है। विवादित भूमि के à¤...लावा à¤...न्य जमीन à¤-ैर विवादित चकबंदी की क्रियाà¤" तक संय क्त रही है। जैसा कि नकल à¤-तौनी आकार पत्र 23 व à¤...न्य काà¤-जात के à¤...वलोकन से स्पष्ट है बयान मजीद मे कहा à¤-या है कि फरीकै न मुस्तर्का तौर पर है। à¤"र मकान को एक ही है। इसका à¤-ण्डन कृपानाथ ने à¤...पने बयान मजीद में नहीं किया है। जिरह में रामनरेश ने कहा है कि बंटवारा हुये 10-12 साल हुआ। 10-12 साल के बाद से उसे तीन नम्बर à¤...लà¤- से मिला। 10-12 साल के पहले उऩके पास तनहा नम्बर नही था। रामनरेश ने कहा है कि विवादित भूमि मे उनका हिस्सा होता है लेकिन कृपानाथ ने बयान मजीद में कहा है कि रामनरेश को तनहा जमीन में उऩका हिस्सा नहीं होता। कृपानाथ की à¤"र से जिरह मे यह पूछा à¤-या है कि बंटवारा हुये 50-55 साल हुआ उत्तर सो साल हुआ होà¤-ा फिर à¤-द कहा कि 10-11 साल हो à¤-या है" इसके उत्तर में यह कहा जाता है कि बंटवारा पुराना है à¤"र राम नरेश को विवादित भूमि मे हक नहीं मिलना चाहिये। यह बहस उचित व न्याय संà¤-त नहीं प्रतीत होती। इसका कारण यह है कि बयान मजीद मे कृपानाथ के बंटवारे के संबंध में कुछ नही कहा है बंटवारे के संबंध में सही स्थिति को छिपाने की à¤-रज से वे मौन रहे है। स्वयं जिरह दिनांक 16.08.78 के कृपानाथ द्वारा यह पूछा à¤-या है कि बंटवारा हुये 50-55 साल हुआ इससे यह जाहिर होता है। कि बंटवारा हुये 50-55 साल यदि माना जाय तब फरीकै न में बंटवारा सन् 1938 या 1933 वाली है। इस आधार पर विवादित भूमि का मुà¤-्तारी होना ही साबित होता है। उत्तरा में 100 साल से के में कहा à¤-ई प्रतीत होती है। पूरे बयान से यह जाहिर होता है कि बंटवारा हुय 10-12 साल हुआ। रामनरेश ने बयान मजकूर में यह कहा है कि 7-8 साल से फरीकै न में बीच नामहककी हो à¤-ई है à¤"र यही साक्ष्य हेतु वकील द्वारा मुकदमें को कहा दिया à¤-या है। नकल आकार पत्र 23 से फरीकै न की जायदाद भी मुà¤-्तारी तथा à¤-ेती बारी का मुà¤-्तारी à¤...ब तक रहना प्रमाणित है। बुधावन ने 1965 में ही उनका à¤...ंश तस्लीम कर चुके हैं। रामनरेश के कथन में दà¤-ल प्रतीत होती है। क्योंकि बुधावन के जीवन काल में उनके बयान से विवादित बाद को कहा करने का साहस नहीं किया à¤-या। आदेश तथा कब्जा परिवर्तन के बहुत दिन बाद नामहककी के कारण वाद बढ़ा दिया à¤-या प्रतीत होता है। यह कोरी क्षति तथा बयान मजकूर में कूपा नाथ द्वारा इसका à¤-ण्डन न करना रामनरेश के हक को साबित करने में बढ़ावा देता है। चकबंदी में à¤-ाते का विभाजन न करा कर चक्र एक में ही रà¤-ना यह साबित करता है कि चकबंदी क्रियाà¤" तक फरीकै न संयक्त रहे हैं à¤"र प्र तिवादी में संयक्त रही है ।

रामनरेश के विद्वान वकील ने बुझावन मृतक के बयान दिनांक 15- 3-65 को à¤"र ध्यान आकर्षित करते हुये यह बहस किया कि उक्त बयान धारा 32 कानून सहादत में पढ़ा जायेà¤-ा à¤"र तथा स्वीकारोक्ति के कारण विवादित भूमि में रामनरेश आदि को हक मिलना चाहिये । इस पर यह बहस किया à¤-या कि उक्त बयान की कोई कीमत नहीं है। यह कथन उचित व न्याय संà¤-त नहीं प्रतीत होता है। हालाकि बयान बिना हलक है। जो आर्डर 10 नियम 2 यदि माना जाय तब भी सहà¤-ातेदारों को स्वीकारोक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। इसके à¤...लावा स्वयं बुझावन ने उक्त बयान के à¤-िलाफ कोई भी कार्यवाही नहीं किया कृपानाथ ने दिनांक 15-3-65 के बयान व आदेश के के फलस्वरूप कब्जा परिवर्तन के बहुत दिन बाद तक मौन बैठे रहे इसके विपरीत कोई कार्यवाही नहीं किया। कृपानाथ कब्जा परिवर्तन के बहुत दिन बाद न्यायालय à¤...पील में इस आज्ञा के साथ बहस व फै सला कराया à¤-या कि रामनरेश उनके à¤-ानदान के नहीं है। जैसा कि रिमाण्ड आदेश से स्पष्ट है।

उक्त परिस्थितियाँ कृपा नाथ के हक में प्रतिकूल तथा रामनरेश आदि के हक के पक्ष में प्रभाव डालती है। à¤-ानदान का एक होना तथा संयक्त रहना रामनरेश के मजकूर बयान से साबित है। बयान बु झा वन à¤...तयंत रेलवेंट ( ) है तथा सबूत में पढ़ा जायेà¤-ा। यह एक हक की स्वीकारोक्ति है जो मुकदमें की वर्तमान परिस्थितियों व शहादत सबूत पर विशेष à¤...सर डालता है दोनो à¤-ाता निजाई के विवादित नम्बरान 281/ 119-7, 413/ 112-13, 731/ 0-10- है। à¤-ा०सं० 281/ 0-14-2 , व 413/ 0-7-03 जमन 8 रामसुमेरन व बु झा वन के नाम काà¤-जात सन् 1323 फ० में दर्ज है। सन् 1359 फ० à¤-ाटा सं० 281,413, 731, रामनाथ व कृपा नाथ पुत्र à¤-ण रामसुमेर व बु झा वन के नाम मुद्दत 42 साल पहले नहीं लिà¤-ी à¤-ई है। सन् 1359 फ० 296, 297, 444 जमन 7 रामनरेश व सुरेश के नाम दर्ज है। रामनरेश द्वारा दाà¤-िल किये à¤-ये à¤-तौनी सन् 1323 फ० में à¤-ाता 11 7 नम्बरान à¤-ा०सं० 76, 514 मुस्तर्का फरीकै न के नाम दर्ज है। इसी में à¤-ा० सं० 413 रामसुमेर बु झा वन के नाम à¤-ा०सं० 413 मुद्दत 7 साल से जमन 8 दर्ज है। रामनरेश व रामसुरेश की उजूरदारी का पैरा 3 à¤...à¤-ण्डित है जिसमें कहा à¤-या है कि आराजीयत्मनिजाई पूर्वजों के समय की मुस्तर्का पैदा करदा है। विस्तृत बयान जिसकी विवेचना फै सले में की à¤-ई है से साबि होता है कि वि० भू मुस्तर्का हालत में मुà¤-्तविदा किया à¤-या है। बंटवारे का हक यह बाद बंटवारा पैदा करने का कोई के स भी रामनाथ व कृष्णनाथ का नहीं है। रामनरेश व सुरेश का हक बुझावन जो तस्लीम था कि जिससे उनके हक को बल मिलता है। प्रस्तुत बाद को वर्तमान परिस्थितियों में आर०डी० 1867 पृष्ठ सं० 226 पर दी à¤-ई व्यवस्था का कोई लाभ कृपानाथ आदि को नहीं मिल सकता । न तो उक्त व्यवस्था फरीकै न बीच लाà¤-ू होती है। आर०डी० 1976 ( वा० 1 पृष्ठ सं 277 पर यह व्यवस्था दी à¤-ई है कि ज्वाइन्ट हिन्दू प्रापर्टी à¤"र ज्वाइंट हिन्दू टेनेंसी में à¤...ंतर है इसमें यह भी व्यवस्था दी à¤-ई है कि वि० भू० के मुस्तर्का à¤...र्जित करने को साबित करने की जिम्मेदारी उस पर है ता ऐस कहता है। वर्तमान वाद के यह तथ्य रामनरेश व रामसुरेश के à¤...à¤-ण्डित बयान से साबित है जिससे उक्त व्यवस्था का कोई लाभ रामनाथ व कृपानाथ को नहीं मिल सकता। उक्त मिसिल में वादी उक्त तथ्य को साबित करने में बिल्कुल à¤...सफल रहा है। दोनो बात की परिस्थितियां भिन्न है। रामनाथ कृपानाथ द्वारा दिये à¤-ये प्रार्थना पत्र दिनांक 13.11.78 के तहत में ए०डब्लू०सी० 1977 पृष्ठ सं० 418 पेश नहीं कियI à¤-या। आर०डी० 1970 दिया à¤-या है जिसमें कुल पृष्ठ 566 है। इस किताब में स्लिप रà¤-ी à¤-ई है जिसमें आर०डी० 1970 पृष्ठ 218 à¤...ंकित है। यह फरीकै न के के स से संबंधित नहीं है।

पक्षों के सबूत शहादत के à¤...ध्ययन के पश्चात् मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि विवादित भूमि में रामसुरेश व रामनरेश सहà¤-ातेदार हैं तथा उनका à¤...ंश 1/2 है। 1/2 à¤...ंश रामनाथ व कृपा नाथ का है। वैसे बंटवारा की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि फरीकै न का à¤...ंश आज भी चकबंदी में मुश्तर्का है। तनकीह इस प्रकार निर्णीत की à¤-ईI

उपर्युक्त र्यु विवेचन के आधार पर निम्न आदेश पारित किये जाते हैं।

पत्रावली बाद à¤...मलदरामद दाà¤-िल दफ्तर हो।"

(Emphasis supplied)

5.

Original petitioners being aggrieved by aforesaid order filed an appeal before Settlement Officer of Consolidation, which was allowed vide order dated 28.02.1979, whereby the order passed by the Consolidation Officer was set aside. It was directed that on Khata No. 112 and 334 name of appellants Kripanath and Ramnath (petitioners herein) be recorded and that their of self acquisition of land in dispute was accepted. Relevant part of order dated 28.02.1979 is reproduced hereinafter:

"पक्षों के विद्वान à¤...धिवक्ता की बहस सुनी à¤-ई तथा à¤...धीनस्थ न्यायालय की पत्रावली का à¤...वलोकन ध्यानपूर्वक किया à¤-या। à¤...पीलांट के विद्वान ने बहस की कि नकल à¤-तौनी 1323 फ० दाà¤-िल की à¤-यी है। जिसमें रामनाथ कृपानाथ के पिता राम सुमेर बुझावन पुत्र बृजा का नाम दर्ज है। नकल à¤-तौनी 1359 फ० दाà¤-िल की à¤-ई है।

इसमें भी रामनााथ कृपानाथ पुत्रान सुमेर बुझावन नकल बृजा का नाम दर्ज है। यह भी उल्लेà¤-नीय है कि à¤-ा० सं० 413, 431 1359 फ० की à¤-तौनी में रामनाथ , कृपानाथ पुत्रान रामसुमेर बुझावन वल्द बृजा के नाम विभाà¤- 7 व 17 में दर्ज है। तथा रामनरेश रामसुमेर पुत्रान महावीर के नाम भी à¤...लà¤- à¤-ाते में à¤-ाटा सं० 296 , 397, 444 मुद्दत 8 साल से दर्ज है। à¤...धीनस्थ न्यायालय के समक्ष रामनरेश रामसुरेश पुत्रान महावीर ने आपत्ति की थी कि आराजी निजाई मुस्तर्का तौर पर पैदा की हुई सम्पत्ति है किन्तु नकल à¤-तौनी 1323 फ० तथा 1359 फ० से यह स्पष्ट है कि आराजी निजाई तनहा रामसुमेर बुधावन पुत्रान बृजा द्वारा पैदा की à¤-ई थी क्या रामसुरेश रामनरेश के पिता ने आराजी निजाई à¤...र्जित नहीं की थी । नकल à¤-तौनी 1359 फ० से यह भी स्पष्ट है कि रामनरेश , रामसुरेश द्वारा भी तनहा कुछ आराजी à¤...र्जित की à¤-ई थी जिसमें रामनाथ कृपानाथ तथा बुझावन आदि का नाम दर्ज नहीं है। तथा इस आराजी पर उन्होंने सहà¤-ातेदारी दर्ज किये जाने का दावा नहीं किया है। इस संबंध में à¤...पीलान्ट के विद्वान à¤...धिवक्ता ने 1976 आर०डी० पृष्ठ संà¤-्या 210 , 1970 आर०डी० पृष्ठ सं 198 तथा ए०डब्ल्यू० सी० 1977 पृष्ठ सं० 418 का भी हवाला देते हुये यह भी बहस की कि शामिलात में रहते हुये उमरा सभी द्वारा भी à¤...लà¤- à¤...लà¤- भूमि à¤...र्जित ( सेपरेट एक्वीजन ) की सकती है। रेस्पान्टेन्ट के विद्वान à¤...धिवक्ता ने बहस को कि जब भी उभयपक्षो के नाम कुछ आराजी शामिलात में है तथा बुझावन पुत्र बृजा का बयान à¤...धीनस्थ न्यायालय के समक्ष हुआ था जिसमें उसने रामनरेश व रामसुरेश पुत्रान महावीर का नाम बतौर सहà¤-ातेदार दर्ज होने की स्वीकृत दी थी।

इसलिये संयक्तु हिन्दू परिवार का प्रिजम्पसन होना चाहिये तथा विवादित भूमि पर भी रेस्पान्डेन्ट का नाम दर्ज किया जाना चाहिये।

मैं रेस्पान्डेन्ट के विद्वान à¤...धिवक्ता से सहमत नहीं हूँ। क्योंकि बु झा वन , रामनरेश का बयान शामिलात में दर्ज किया à¤-या था जिसमें विवादित भूमि का कोई उल्लेà¤- भी नहीं है। तथा इस प्रकार का बयान कानून की दृष्टि में कोई बयान नहीं है तथा उभय पक्षों शामिल रहते हुए भी à¤...लà¤--à¤...लà¤- आराजी à¤...र्जित कर सकते हैं।

विवादित भूमि तनहा कृपा नाथ रामनाथ के पिता रामसुमेर व बु झा वन द्वारा आदेश से à¤...र्जित की à¤-ई थी। इसलिए रामनरेश, रामसुरेश पुत्रान महावीर का नाम बतौर सहà¤-ातेदार दर्ज किये जाने का कोई à¤"चित्य नहीं है।

उपरोक्त विवेचन के आधार पर निम्न आदेश देता हूँ।

à¤...पील स्वीकार की जाती है। च०à¤...० का आदेश निरस्त किया जाता है तथा आदेश दिया जाता है कि à¤-ाता संà¤-्या 112 व 334 तनहा à¤...पीलान्ट कृपानाथ व रामनाथ पुत्रान रामसुमेर के नाम पूर्ववत् दर्ज रà¤-ा जाए। पत्रावली बाद à¤...मलदरामद संचित हो। (Emphasis supplied)

6.

Aforesaid order was thereafter challenged by contesting respondents by way of filing a revision before Deputy Director of Consolidation, which was allowed vide order dated 05.12.1980 and order passed by Settlement Officer of Consolidation was set aside and order passed by Consolidation Officer was affirmed. Relevant part of order is reproduced hereinafter:

मैने पक्षों की बहस सुनी है तथा à¤...भिलेà¤-ों का à¤...वलोकन किया है पक्षो की स्वीकृत वंशावली निम्न लिà¤-ित हैः-

पुनरीक्षण कर्ताà¤-ण का के स यह है कि बिरजा à¤"र महावीर का परिवार संयक्तु था à¤"र विवादित भूमि संयक्त परिवार की उपार्जित भूमि थी à¤"र बिरजा सबसे बड़े भाई थे à¤"र परिवार के कर्ता थे। à¤...तः विवादित भूमि उनके नाम प्रतिनिधि रूप में दर्ज थी à¤"र वास्तव में यह बिरजा à¤"र महावीर की संयक्तु रूप से उपार्जित भूमि थी। उनका कहना है कि इसलिये चकबंदी में विवाद उठाने पर बुझावन ने उस समय परिवार के कर्ता होने के नाते विद्वान चकबंदी à¤...धिकारी के समक्ष दिनांक 15/3/65 को बयान देकर यह स्वीकार कर लिया कि भूमि में महावीर के पुत्रों रामनरेश आदि का भी हिस्सा है à¤"र वे सहà¤-ातेदार हैं उनका यह कहना है कि जब तक बु झा वन जीवित रहे à¤"र परिवार के कर्ता के रूप में थे तब तक रामनाथ à¤"र कृपानाथ चुप रहे à¤"र 1975 में जब बु झा वन की मृत्यु हो à¤-ई तब रामनाथ à¤"र कृपानाथ ने पहले से स्थिति को उलटने का प्रयत्न चलाया। 1325 फ० की à¤-तौनी के à¤...नुसार भूà¤-ण्ड संà¤-्या 281 à¤"र 413 रामसुमेर à¤"र बुझावन को दà¤-ीलकारी à¤"र à¤-ैर दà¤-ील कारी काश्त दर्ज है। 1359 फ० की à¤-तौनी में तीनों भूà¤-ण्ड रामनाथ कृपानाथ à¤"र बुझावन को जमन 6, जमन 7 à¤"र 17 की आराजी दर्ज है उसी आधार पर विद्वान चकबंदी à¤...धिकारी ने यह निर्णय दिया है कि यह भूमि रामसुमेर à¤"र बुझावन द्वारा तनहा पैदा की à¤-ई थी उन्होंने बुझावन à¤"र रामनरेश दोनों के इकट्ठा बयान दर्ज करने को à¤-ैर कानूनी बताया है। किन्तु विद्वान सहायक बंदोबस्त à¤...धिकारी चकबंदी का उक्त निर्णय सही नहीं है । कानून में ऐसी कोई मुमानियत नहीं है कि दो व्यक्तियों का बयान एक साथ दर्ज न किया जाय। ऐसी दशा में यदि दिनांक 13/3/65 को विद्वान च०à¤...० ने रामनाथ à¤"र बुझावन दोनों का इकट्ठा एक बयान दर्ज किया तो उसमें कोई à¤...नुचित बात नहीं है यदि दो आदमी एक ही बात सहमति पूर्वक कहते हैं तो समय बचाने के लिये यदि दोनों का बयान à¤...लà¤- दर्ज न करके एक में ही दर्ज किया à¤-या तो उसमें कोई à¤...नुचित बात नहीं है, उक्त बयान के संबंध में विशेष बात यह है कि पुनर्नीरीक्षण की सुनवाई के पहले उक्त बयान का मुà¤-्य पन्ना पड लिया à¤-या है à¤"र इस प्रकार उक्त बयान के प्रभाव की समाप्ति करने की चेष्टा की à¤-ई है। किन्तु उक्त बयान को à¤...स्तित्वहीन इसलिये नहीं माना जा सकता क्योंकि विद्वान चकबंदी à¤...धिकारी ने उक्त बयान का संदर्भ देते हुये आदेश दिनांक 15/3/65 को जो आदेश पारित किया है। उस पर बुझावन à¤"र रामनरेश दोनों ने हस्ताक्षर किये हैं à¤"र दोनों का हस्ताक्षर à¤...भी उनको भी मौजूद है। दसरी बात यह है कि दोनों à¤...धीनस्थ न्यायालयों ने उक्त बयान के à¤...स्तित्व को स्वीकार किया है à¤"र इस प्रकार उक्त बयान एक वास्तविकता है तीसरी बात यह है कि उक्त बयान के आधार पर पारित आदेश दिनांक 15/3/65 के द्वारा विवादित भूमि 11 वर्षों तक दोनों पक्षों को सहà¤-ातेदार à¤...ंकित रही वस्तुतः इस तथ्य को केवल बयान फट जाने से मिटाया नहीं जा सकता इस प्रकार यह तथ्य à¤...ंतिम रूप से सिद्ध है कि बुझावन à¤"र रामनाथ ने दिनांक 15/3/65 को विद्वान चकबंदी के समक्ष उपस्थित होकर संयक्त रूप से ु बयान दिया था कि विवादित भूमि में रामनरेश आदि सहà¤-ातेदार हैं à¤"र तदनुसार रामनरेश आदि का भी नाम विवादित भूमि सहà¤-ातेदारों के रूप में दर्ज किया à¤-या था।

विपक्षीà¤-ण की à¤"र से कहा à¤-या है कि रामनाथ आदि के नाम कुछ भूमि तनहा है कि उन्हें हिस्सा नहीं लिया है किन्तु इसके विपरीत रामनरेश आदि की à¤"र से यह कहा à¤-या है कि चकबंदी प्रक्रिया तक à¤...धिकाँश भूमि दोनों पक्षों के नाम संयक्त रूप में ही थी à¤"र दोनों परिवार संयक्त रूप से रहते थे कृपानाथ ने à¤...पने बयान में स्वीकार किया है कि दोनों पक्षकार एक ही घर में रहते हैं। कृपानाथ ने इस बयान में यह भी कहा है कि उनका बुझावन रामनरेश à¤"र रामसुरेश सबका चक मुश्तर्का बना हुआ है। पत्रावली में चक संà¤-्या 321 का जो विवरण आया हुआ है उससे भी स्पष्ट होता है कि मार्च 77 तक दोनों पक्षों का सम्मिलित चक बना हुआ था यह इस बात का प्रमाण है कि 1965 में उक्त आदेश जब हुआ था तो दोनों पक्ष संयक्त परिवार में रहे हैं। कृपानाथ ने à¤...पने बयान में यह नहीं बताया कि उनका संयक्त परिवार कब विभक्त हुआ किन्तु उन्होंने à¤...पने बयान में स्वीकार किया है कि उन लोà¤-ों ने कोई à¤-ेत तनहा पैदा नहीं किया है à¤"र विवादित भूमि बाप दादा के समय की है। इसमें यह बात भलीभाँति स्पष्ट है कि कृपानाथ à¤"र रामनाथ की विवादित भूमि के उपार्जन के संबंध में कोई धन नहीं है à¤"र जो भी धन था उनके बाबा बुझावन का था à¤"र चूंकि भूमि संयक्त रूप से उपार्जित थी à¤...तः बुझावन ने उसमें रामनरेश आदि का हिस्सा स्वीकार किया रामनरेश ने à¤...पने बयान में बताया है कि 10 साल पहले सारी à¤-ेती बारी संयक्त रूप से होती थी । एक बार प्रश्न न के कारण रामनरेश ने " बंटवारा हुये 10 साल हुआ " यह कह दिया किन्तु तुरन्त उन्होंने इस बात को स्पष्ट रूप करते हुये बटवारा होने की à¤...वधि 10-12 साल बताई यह देà¤-ते- हुये कि à¤...धिकांश भूमि दोनों पक्षों के साथ थी à¤"र चकबंदी में भी दोनों पक्षों के नाम संयक्तु चक बने , यही बात सिद्ध होता है कि चकबंदी के प्रारंभिक दिनों में दोनों पक्ष संयक्त परिवार में ही रहते थे ए०डब्ल्यू० सी० 1937 पृष्ठ 418 , आर०डी० 1970 पृष्ठ 198 आर०डी० 1976 (2) पृष्ठ 226 की व्यवस्थाà¤"ं का संदर्भ देकर यह कहा à¤-या है कि संयक्त प ु रिवार में भी कोई भी व्यक्ति à¤...लà¤- से भूमि उपार्जित कर सकता है à¤"र चूंकि à¤-तौनी में यह भूमि à¤...केले बुझावन व राम सुमेर के मध्य थी à¤...तः उसमें महावीर के लड़कों का हिस्सा नहीं माना चाहिये । इस बात में संदेह नहीं है कि संयक्त प ु रिवार में रहते हुये भी कोई सदस्य à¤...पने नाम से à¤...लà¤- भूमि उपार्जित कर सकता है । किन्तु जब परिवार संयक्त हो तो यह सिद्ध करना भी आवश्यक है कि à¤...पने लिये à¤...लà¤- आय के साधन से इस सदस्य ने यह भूमि उपार्जित की । इस बात का कोई साक्ष्य नहीं दिया à¤-या है कि संयक्त परिवार की à¤-ेती बारी के à¤...तिरिक्त बिरजा के पास आय का कोई तनहा साधन भी था ऐसी दशा में विवादित भूमि को तनहा बिरजा को मानने का कोई à¤"चित्य नहीं है विशेष रूप में जब कि वह सबसे बड़े भाई थे à¤"र परिवार के कर्ता थे आर०डी० 1976 पृष्ठ 271 , आर०डी० 1975 पृष्ठ 218 की व्यवस्थाà¤" से स्पष्ट है ं कि जब तक परिवार संयक्त हो तब तक ु किसी भी भूमि को तनहा सिद्ध करने के लिये à¤...लà¤- साक्ष्य आवश्यक है जो नहीं दिया à¤-या है ।

इस मामले में कुछ विशेष परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनके कारण विवादित भूमि को संयक्त परिवार की भूमि मानने का बहुत बड़ा à¤"चित्य है । पहली बात तो बु झा वन का स्वीकृत मृतक बयान दिनांक 15/3/65 है जिसके द्वारा उन्होंने विवादित भूमि में रामनरेश आदि को सहà¤-ातेदार स्वीकार किया à¤"र यदि रामनरेश आदि के नाम तनहा दर्ज भूमि की संयक्तु परिवार की सम्पत्ति होती तो बिना उसमें हिस्सा दिये हुये बु झा वन ऐसा बयान न देते किन्तु जब उसमें उनका हिस्सा नहीं था तभी उन्होंने ऐसा बयान न देते किन्तु जब उसमें उनका हिस्सा नहीं था तभी उन्होंने ऐसा बयान दिया à¤...तः यह नहीं कहा जा सकता कि रामनरेश आदि के नाम तनहा दर्ज भूमि में हिस्सा पाने के कारण विवादित भूमि में रामनरेश आदि को भी सहà¤-ातेदार न माना जाय । दसरी परिस्थिति यह है कि रामनाथ à¤"र कृपानाथ ने भी बु झा वन के जीवन काल में उपर्युक्त सहà¤-ातेदारी को स् र्यु वीकार किया à¤"र 1965 से 1976 तक दोनों पक्ष सहà¤-ातेदार दर्ज रहे । दोनों कI चक संयक्त रहा à¤"र रामनाथ à¤"र कपानाथ ने इस पर कोई आपत्ति प्रस्तुत नहीं की कृपानाथ के बयान के à¤...नुसार बु झा वन 26/8/75 को मरे à¤"र उनकी मृत्यु के बाद कृपानाथ à¤"र रामनाथ ने इस पूर्णतया तयशुदा मामले को फिर से उलटने का यह प्रयास किया है किसी भी व्यक्ति को यह à¤...नुमति नहीं दी जा सकती कि यह एक तथ्य स्वीकार कर ले à¤"र कि एक पीढ़ी बीत जाने पर उसे फिर से उलट कर दसरा तथ्य प्रतिष्ठित करे । रामनाथ à¤"र कृपानाथ की à¤"र से यह भी कहा à¤-या है कि दिनांक 15/3/65 के सुलहनामें का बयान में वह पक्ष नहीं था à¤...तः यह उन पर बाध्यकारी नहीं है । किन्तु यह तर्क भी à¤-लत है ए०आई० आर० 1975 पंजाब परिभाषा-12 में माननीय पंजाब उच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि जहाँ दोनों पक्षों का नाम बहुत दिनों तक सहà¤-ातेदार के रूप में दर्ज रहा हो। वहाँ एक पक्ष बहुत दिनों के बाद यह चुनौती देने से बाधित है कि इसमें दसरे पक्ष का हिस्सा नहीं है इस प्रकार बुझावन बयान à¤"र स्वीकारोक्ति दिनांक 15/5/65 उनके लिये एस्टापेल उत्पन्न करती है à¤"र रामनाथ à¤"र कृपानाथ का उक्त निर्णय को स्वीकार कर के 15 वर्ष तक रामनरेश को सहà¤-ातेदार के रूप में स्वीकार करना कनडक्ट à¤"र एक्वासेस के द्वारा उनके विरुद्ध एस्टापेल उत्पन्न करते हैं à¤"र वे à¤...ब यह चुनौती देने से बाधित हैं कि उसमें रामनरेश आदि सहà¤-ातेदार नहीं हैं à¤...तः विद्वान सहायक बंदोबस्त à¤...धिकारी चकबंदी ने विद्वान चकबंदी à¤...धिकारी के आदेश को उलट कर उचित नहीं किया है।

आदेश

पुनरीक्षण स्वीकार किया जाता है तथा सहायक ब०à¤...०च० का आदेश दिनांक 28/3/79 निरस्त किया जाता है à¤"र विद्वान चकबंदी à¤...धिकारी का आदेश दिनांक 13/12/78 पुनरप्रतिष्ठित किया जाता है à¤"र यह निर्णय दिया जाता है कि विवादित भूमि में रामनरेश आदि पुनरीक्षण कर्ता सहà¤-ातेदार हैं तदनुसार à¤...मलदरामद की जाय।" (Emphasis supplied)

7.

Aforesaid order dated 05.12.1980 is challenged before this Court at behest of original petitioners by means of present writ petition filed in 1981, which is finally heard and decided after about 45 years.

8.

Sri Rakesh Pathak, learned counsel for petitioners, submitted that when matter was remitted back by Appellate Authority it has to be decided on merit, however, on remand the Consolidation Officer has erroneously relied on statements recorded earlier and allowed objections of contesting respondents, whereas the Appellate Authority has rightly considered all aspects of case and on basis of revenue record returned a specific finding that on basis of Khatauni 1323 Fasli and 1359 Fasli respondents have also individually acquired some property whereon original petitioners were not recorded as co-tenure holders.

9.

Similarly so far as land in dispute is concerned, i.e., Khata No. 112 and 334, it was solely acquired by original petitioners and, therefore, appeal was rightly allowed on basis of revenue record of 1323 Fasli that it was not acquired by Ram Sumer and Bujawan sons of Birja. Learned counsel further submitted that even a member of joint Hindu family can acquire independent property.

10.

Learned counsel further submitted that aforesaid findings returned by Appellate Authority was wrongly interfered by Revisional Authority and by erroneously placing reliance on statements recorded in first round of litigation, without taking note that when matter was remitted in earlier round of litigation by Appellate Authority, it was directed that matter be decided on merit. He further submitted that only on ground that name of all respondents were recorded as co-tenure for about a decade after first order was passed by Consolidation Officer, cannot be considered an adverse factor since subsequently order of Consolidation Officer was set aside, therefore, adverse effect, if any was no longer exist.

11.

Per contra, Sri Sunil Kumar Singh, learned counsel appearing for contesting respondents, has supported the impugned order that when matter was remitted back to Consolidation Officer to consider it on merit, the effect of statements recorded earlier were not set aside.

Therefore, it was not legally incorrect when Consolidation Officer as well as Revisional Authority has also taken note of said statements alongwith statements recorded subsequently.

12.

Learned counsel for respondents further submitted that Revisional Authority has considered case in a very detail manner and returned findings on each issues involved, which does not require any interference being not shown perverse.

13.

I have considered the aforesaid submissions and perused the material available on record.

14.

The pedigree, as mentioned in para 4 of present judgment is not under dispute that original petitioners, i.e., Ram Nath and Kripa Nath and contesting respondent, Ram Naresh, belonged to common ancestors as well as that jointness of family was not much disputed even by petitioners. Therefore, the family remained a joint family and entire property come from ancestors remain joint property of an undivided joint family, except a land if acquired independently from own source by any member of join family.

15.

According to Sijra, Fakir has 4 sons namely Bihari, Birja, Dasrath and Mahaveer. Bihari and Dasrath died issueless. Mahaveer was younger, therefore, Birja was acting as Karta and therefore his name was recorded and consequently name of his son, Bujhawan was recorded in Revenue records. However, the dispute arose when land in question, i.e., Khata No. 112 and 334 was recorded in revenue record solely in the name of petitioners, i.e., Ram Nath and Kripa Nath sons of Bujhawan, whereas contesting respondents filed objections that it being a joint property, their names may also be recorded as co-tenures being sons of Mahaveer, brother of Birja.

16.

The burden to prove that land in dispute was a joint property was on contesting respondents, whereas burden to prove that land in dispute was self acquired was on original petitioners. On basis of record, it could conclusively be concluded that original petitioners have not come up with any material that land in dispute was self acquired by them except their names were recorded. How property in dispute was self acquired by Birja, when undisputedly he was part of Joint family and evidence of partition was very weak. Therefore, from the evidence of contesting respondents as well as statements recorded in first round of litigation as well as statements recorded after remand, it would be evident that claim of respondents of co-tenure was accepted as well as that statements recorded earlier were remained relevant. Even after matter was remitted by Appellate Authority in first round of litigation. Therefore, there was no legal error when same was considered by Consolidation Officer as well as Revisional Authority alongwith other statements and documentary evidence.

17.

A plea that there was a partition in joint family was not sustainable since evidence in this regard on basis of statements of witnesses appears to be very vague and weak as witnesses were not able to state, when partition took place. Some have said about 15-20 years ago and some have said that partition took place about 100 years ago, however, it being not supported by any document, therefore, it was rightly rejected by Consolidation Officer as well as Deputy Director of Consolidation.

18.

Another factor which is also relevant is that after the Consolidation Officer passed order dated 15.03.1965, the land in dispute remained in name of petitioners as well as contesting respondents being co-tenure holders. Petitioners have never taken any steps for a decade to challenge it and have filed an appeal after a decade, which was allowed and matter was remitted back to the Consolidation Officer to pass a fresh order. Their chak were also remained undivided, which shows land remained a part of joint family. Birja had taken advantage of position of Karta after his two brothers died issueless and third brother Mahaveer was not active and recorded name of his son solely without adding name of contesting respondents.

19.

At this juncture it would be appropriate to reproduce some paragraphs of a recent judgment passed by Supreme Court in the case of Dorairaj vs. Doraisamy (Dead) Through Lrs and others, 2026 INSC 126 as under:

"32. On the plea of prior partition or division in status, the High Court recognised that separate enjoyment of portions, installation of irrigation facilities, or even obtaining borrowings individually, do not by themselves establish partition in law. What is required is a clear and unequivocal intention to sever the joint status. The High Court correctly emphasized that all relevant conveyances described the interests conveyed as undivided shares, that there was no mutation evidencing division, and that there was no separate payment towards borrowings. In the absence of any declaration or conduct evidencing an intention to divide, the inference of continued joint family status was inevitable."

20.

The outcome of above discussion, on facts as well as on law, is that contesting respondents have able to show that property in question always remained a joint property and their names were wrongly deleted despite they belong to common ancestors. Petitioners were absolutely failed to show that how and under what manner, they have self acquired the property in dispute. Their claim remain unsupported by any pleading i.e. documentary and oral.

21.

There are multiple evidence on record that parties remained a joint family that they resided in one house and there is no specific finding on record that any partition took place, therefore, land in dispute always remained a part of joint property and accordingly all parties remained co-tenure holders. Petitioners here have also not taken any step for partition. There was no evidence of any act or clear intention of partition.

22.

A well reasoned order passed by Consolidation Officer upheld by Deputy Director of Consolidation by another reasoned order, cannot be interfered since there is no perversity. The Appellate Authority has wrongly traveled beyond the evidence and recorded finding of partition and self acquired property without any evidence, only on basis of revenue entry, without any consideration, whether such entries were supported by any evidence i.e. documentary or oral and therefore, has recorded a perverse finding.

23.

The writ petition has no force and is accordingly dismissed.

24.

Interim order, if any, stands vacated.