High CourtsSingle Bench

Monu Sahu @ Krishna Gopal vs State Of M.P

Madhya Pradesh High Court · Decided on 6 March 2020 · Citation: (2020) 03 MP CK 0194

HON’BLE JUDGES
Anand Pathak, J
ACTS & SECTIONS REFERRED
Code Of Criminal Procedure, 1973 — Section 439 · Indian Penal Code, 1860 — Section 201, 302
CASE NUMBER
Miscellaneous Criminal Case No. 8578 Of 2020
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Judgment

20 paragraphs · 822 words

With consent heard finally.

The applicant has filed this first application under Section 439 of Cr.P.C for grant of bail, who has been arrested and is in custody since 5.12.2019 in connection with Crime No.438/2019 registered at Police Station, Kurwai, District Vidisha, for the offence punishable under Sections 302 and 201 of IPC.

It is the submission of learned counsel for the applicant that applicant is suffering confinement since 5.12.2019 on false pretext and charge-sheet has already been filed. It is further submitted that except motive, no other ingredient to implicate the applicant exists. He relied upon judgments of Apex Court in the case of Surinder Kumar vs. State of Punjab, 1999 SCC (Cri) 33 and Sampath Kumar vs. Inspector of Police, Krishnagiri, (2012) 4 SCC 124 and submits that motive alone cannot be the ground for conviction. Even otherwise, no custodial interrogation is required because charge-sheet has already been filed. He undertakes to cooperate in trial and to perform community service.

Learned Public Prosecutor for the State opposed the prayer and prayed for dismissal of the application.

Considering the submissions advanced, looking to the facts and circumstances of the case, but without commenting on the merits of the case, the application is allowed. It is directed that the applicant shall be released on bail on his furnishing personal bond in the sum of Rs.50,000/- (Rupees Fifty Thousand Only) with one solvent surety of the like amount to the satisfaction of Trial Court concerned.

This order will remain operative subject to compliance of the following conditions by the applicant:-

1.

आवेदक स्वंय द्वारा निष्पादित बंद पत्र की समस्त निबंधनो एवं शर्तो का अनुपालन करेगा।

2.

आवेदक अन्वेषण/विचारण में प्रकरण एवं निर्देशानुसार सहयोग करेगा।

3.

आवेदक मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति को प्रलोभन, धमकी अथवा वचन देने में स्वयं को लिप्त नहीं करेगा, जो कि उसे/उसको ऐसे तथ्यों को न्यायालय या पुलिस अधिकारी से प्रकटीकरण करने से प्रवरित करे, जैसी भी स्थिति हो;

4.

आवेदक जिस अपराध के लिए दोषी है उस प्रकार का समान अपराध कारित नहीं करेगा ।

5.

आवेदक विचारण के दौरान अनावश्यक स्थगन की मॉग नही करेगा।

6.

आवेदक विचारण न्यायालय/अन्वेषण अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना भारत नही छोडेगा। जैसी भी स्थिति हो एवं;

7.

आवदेक ट्रायल के दौरान प्रत्येक महीने के पहले दिन सुबह 10.30 से दोपहर 2.30 बजे तक सबंधित पुलिस थाने में अपनी उपस्थिति दर्ज करवायेगा, एवं भविष्य में किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नही होगा।

8.

एतद् द्वारा यह निर्देशित किया जाता है कि आवेदक 2 पौधो का (फल देने वाले पेड़ अथवा नीम/पीपल) रोपण करेगा तथा उसे अपने आस पडोस में पेड़ की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाने की व्यवस्था करनी होगी ताकि पौधा सुरक्षित रह सके। आवेदक का यह कर्तव्य है कि न केवल पौधों को लगाया जाऐ, बल्कि उन्हें पोषण भी दिया जाए। ''वृक्षारोपण के साथ, वृक्षापोषण भी आवश्यक है।" आवेदक विशेषतः 6-8 फीट ऊॅंचे पौधे/पेड़ों को लगायेगा ताकि वे शीघ्र ही पूर्ण विकसित हो सकें। अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए, आवेदक को रिहा किये जाने की दिनांक से 30 दिनों के भीतर संबंधित विचारण न्यायालय के समक्ष वृक्षों/पौधों के रोपण के सभी फोटो प्रस्तुत करना होगें। तत्पश्चात्, विचारण के समापन तक हर तीन महीने में आवेदक के द्वारा विचारण न्यायालय के समक्ष प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी ।

वृक्षों की प्रगति पर निगरानी रखना विचारण न्यायालय का कर्तव्य है क्योंकि पर्यावरण क्षरण के कारण मानव अस्तित्व दांव पर है और न्यायालय अनुपालन के बारे में आवेदक द्वारा दिखाई गई किसी भी लापरवाही को नजर अंदाज नही कर सकता है। इसलिए आवेदक को पेड़ों की प्रगति और आवेदक द्वारा अनुपालन के संबंध में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए निर्देशित किया जाता है एवं आवदेक द्वारा किये गये अनुपालन की एक संक्षप्ति रिपेर्ट इस न्यायालय के समक्ष प्रत्येक तीन माह में (अगले छः महीनों के लिए) रखी जायेगी जिसे कि ''निर्देश '' शीर्ष के अंतर्गत रखा जाएगा।

वृक्षारोपण में या पेड़ों की देखभाल में आवेदक की ओर से की गई कोई भी चूक आवेदक को जमानत का लाभ लेने से वंचित कर सकती है।

आवेदक को अपनी पसंद के स्थान पर इन पौधों/पेडों को रोपने की स्वतंत्रता होगी, यदि वह इन रोपे गये पेडों की ट्री गार्ड या बाड़ लगाकर रक्षा करना चाहता है, अन्यथा आवेदक को वृक्षों के रोपण के लिए तथा उनके सुरक्षा उपायों के लिए आवश्यक खर्चे वहन करना होगें।

इस न्यायालय द्वारा यह निर्देश एक परीक्षण प्रकरण के तौर पर दिए गए हैं ताकि हिंसा और बुराई के विचार का प्रतिकार, सृजन एवं प्रकृति के साथ एकाकार होने के माध्यम से सामांजस्य स्थापित किया जा सके। वर्तमान में मानव अस्तित्व के आवश्यक अंग के रूप में दया, सेवा, प्रेम एवं करूंणा की प्रकृति को विकसित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह मानव जीवन की मूलभूत प्रवृतियां हैं और मानव अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इनका पुनर्जीवित होना आवश्यक है।

''यह प्रयास केवल एक वृक्ष के रोपण का प्रश्न न होकर बल्कि एक विचार के अंकुरण का है।"

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