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Judgment
15 paragraphs · 809 wordsThis is the first application under Section 438 of the Cr.P.C filed by the applicants, who apprehend their arrest in connection with Crime No.82/2019, registered at Police Station Gijorra, District Gwalior, for the offences punishable under Sections 294, 323, 452, 506, 34 of IPC.
As per the pleadings of the bail application, the applicants and complainant belong to same family and a cross-case has been registered in respect of same incident vide crime No.83/19. Cross-case at the instance of present applicants (83/19) is being filed where the allegations are almost same vis-a-vis the present case. Confinement would bring social disrepute and personal inconvenience. Accordingly, prayer for anticipatory bail has been made.
Representative of respondent opposed the prayer and prayed for dismissal of the application.
Heard representative of respondent and perused the pleadings of bail application with the aid of case diary.
Looking to the pleadings that matter is of cross-case wherein both the parties involved in altercation and scuffle and only injuries by way of swelling are over left shoulder and left knee, but without expressing any opinion on merits of the case, I deem it appropriate to allow this application under Section 438 of Cr.P.C.. It is hereby directed that in the event of arrest, the applicants shall be released on bail on furnishing a personal bond of Rs.1,00,000/- (Rupees One Lac only) each with one solvent surety each of the like amount to the satisfaction of Investigating Officer/Investigating Agency.
This order will remain operative subject to compliance of the following conditions by the applicants:-
आवेदकगण उनके द्वारा निष्पादित बंधपत्र के सभी निबंधनों और शर्तों का पालन करेगें;
आवेदकगण अन्वेषण/विचारण में प्रकरणानुसार सहयोग करेगें।
आवेदकगण मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति के लिए प्रलोभन, धमकी अथवा वचन देने में स्वयं को लिप्त नहीं करेगें, जो कि उसे/उसको ऐसे तथ्यों को न्यायालय या पुलिस अधिकारी से प्रकटीकरण करने से प्रवरित करे, जैसी भी स्थिति हो;
आवेदकगण जिस अपराध के अभियुक्त है वैसी ही प्रकृति का समान अपराध कारित नहीं करेगें;
आवेदकगण विचारण के दौरान अनावष्यक स्थगन की मांग नहीं करेगंे;
आवदेकगण विचारण न्यायालय/अन्वेषण अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना भारत नहीं छोडे़गें, जैसी भी स्थिति हो;
इसके अतिरिक्त उपरोक्त वर्णित जमानत का लाभ इस शर्त के अधीन होगा कि आवेदकगण प्रत्येक सोमवार और मंगलवार को सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक आगामी एक वर्ष के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र/ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र/ जिला अस्पताल (मुरैना) में अपनी सेवाऐं देगे एवं उनकी भूमिका बाह्य विभाग के मरीजों को, डाॅक्टरों एवं कम्पाउन्डरों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में सहायता करने की होगी। उन्हें ना तो शल्य कक्ष (आपरेषन थियेटर) और ना ही निजी वार्डां में जाने की अनुमति होगी और ना ही किसी प्रकार की दवाई या इंजेक्शन इत्यादि मरीजों को लगाने की अनुमति होगी। वे किसी भी प्रकार से अपने द्वारा मरीजों को संक्रमण अथवा असुविधा नही देगे और डाक्टर इस बात को सुनिश्चित करेगे, ताकि आवेदकगण उक्त अस्पताल के लिए एक सहायक की भूमिका निभाए ना कि अपने किसी कृत्य से मरीजों अथवा डाक्टरों/अस्पताल प्रशासन को किसी प्रकार की असुविधा कारित करे। यह निर्देश आवेदकगण की आयु एवं भविष्य की संभावनाओं को देखकर दिया गया है ताकि उन्हे समाज की मुख्य धारा में आने का एक अवसर प्राप्त हो सके। मुख्य चिकित्सक एवं स्वास्थ्य अधिकारी (ब्डभ्व्)/अस्पताल अधीक्षक जिला (मुरैना), आवेदकगण को बाह्य विभाग में कार्य करने की अनुमति प्रदान करेंगे और आवेदकगण को चिकित्सा सेवाऐं जैसे:- साफ सफाई की व्यवस्था बनाए रखना, प्राथमिक उपचार में सहयोग करना, रजिस्ट्रेषन कार्य एवं मरीजों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर किए जाने वाले कार्य देंगे। इन कार्यों को करने से संभवतः आवेदकगण को प्राथमिक चिकित्सा अथवा प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की प्राथमिक शिक्षा मिल सकेगी, ताकि वह समाज की मुख्य धारा में आने के साथ-साथ अपने क्षेत्र में आपदा प्रबंधन स्वंयसेवक (अवसनदजममतद्ध के तौर पर कार्य कर सके।
यहा यह स्पष्ट किया जाता है कि आवेदकगण अस्पताल/अस्पताल प्रशासन एवं रोगियों के लिए किसी भी प्रकार के संक्रमण/असुविधा अथवा परेशानी का कारण नहीं बनेगें एवं अस्पताल प्रशासन द्वारा उनके दुव्र्यवहार अथवा अवज्ञापूर्ण आचरण की जानकारी मिलने की स्थिति में यह तथ्य उनकी जमानत आवेदन को खारिज करने का आधार बन सकेगा। आवेदकगण द्वारा सुधार के लिए सुझाव और उसके द्वारा किए गए कार्य का प्रतिवेदन, मार्च 2020, में प्रस्तुत किए जायेंगे।
इस न्यायालय द्वारा यह निर्देश एक परीक्षण प्रकरण के तौर पर दिए गए हैं ताकि हिंसा और बुराई के विचार का प्रतिकार, सृजन एवं प्रकृति के साथ एकाकार होने के माध्यम से सामंजस्य स्थापित किया जा सके। वर्तमान में मानव अस्तित्व के आवश्यक अंग के रूप में दया, सेवा, प्रेम एवं करूंणा की प्रकृति को विकसित करने की आवश्यकता है क्योंकि यह मानव जीवन की मूलभूत प्रवृतियां हैं और मानव अस्तित्व को बनाए रखने के लिए इनका पुनर्जीवित होना आवश्यक है। मुख्य चिकित्सक अधिकारी को सूचित किया जाए एवं विचारण न्यायालय को एक मूलप्रति अनुपालन के लिए भेजी जाए।
